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नमामि विठ्ठलेश्वरं सदात्युदार मानसं।
स्वभक्तरक्षणक्षमं व्रजेश भक्तिभावदं॥

द्वितीय गृह निधि प्रभु श्रीविठ्ठलनाथजीकी स्तुति:

सर्वात्माना प्रपन्नानां गोपीनां पोषयन् मनः l
तं वंदे विट्ठलाधीशं गौरश्यामं प्रियान्वितम् ll

भावार्थ –
संपूर्ण अनन्य भावपूर्वक शरण में आये गोपीजनों के मन का पोषण करने वाले श्रीस्वामिनीजी सहित विराजित गौरश्याम स्वरुप श्री विट्ठलनाथजी प्रभु को मैं वंदन करता हुँ।

द्वितीय गृह निधि प्रभु श्रीविठ्ठलनाथजीकी स्वरुप भावना:

श्री ठाकुरजी का स्वरुप श्याम है परन्तु श्री स्वामिनीजी का स्वरुप गौरवर्ण है। श्री स्वामिनीजी के प्रेमविवश हो कर प्रभु भी आधे गौरवर्ण बन गए अतः श्री मस्तक से कटि तक श्याम एवं कटि से चरणारविन्द तक गौरवर्ण हैं।
दोनों श्रीहस्त कटि पर बिराजित हैं, बायें श्रीहस्त में शंख एवं दायें श्रीहस्त में कमल है।
श्रीमस्तक किरीट मुकुट शोभायमान है। दोनों चरण सीधे हैं, एक चरण में नुपुर आभूषण है जबकि अन्य चरण में नहीं है।
संग में स्वामिनीजी श्रीयमुनाजी विराजित हैं जो कि ठाकुरजी के चतुर्थ स्वामिनीजी हैं। उनके दोनों श्रीहस्त में कमल हैं.

गो. श्रीद्वारकेशजी कृत प्रभु श्रीविठ्ठलनाथजी की स्वरुप भावना को पद
देख्यो अद्भुत रूप सखीरी सुर सुता के साथ l
बिबस भये देख कर सुन्दर कटि पर रहि गए दोऊ हाथ ll 1 ll
तातें गौर चित्र श्यामल तन, उपमा कहत न आवे गाथ l
‘द्वारकेश’ प्रभु यह बिधि देखि, में तो कर लियो जनम सनाथ ll 2 ll

द्वितीयगृह निधि प्रभु श्रीविठ्ठलनाथजी गृह को इतिहास:

चरणाट में श्रीमहाप्रभुजी के यहाँ जिस दिन आपश्रीके द्वितीय पुत्र श्री विठ्ठलनाथजी गुसांईजी का प्राकट्य हुआ उसी दिन एक ब्राह्मण आये जिन्होंने श्री महाप्रभुजी को प्रभु श्री विट्ठलनाथजीको पधराया।
श्री महाप्रभुजी ने प्रसन्न हो कर आज्ञा दी की – “आज प्रभु एवं पुत्र दोनों पधारे हैं इस कारण पुत्रका नाम हम श्री विट्ठलनाथ रखेंगे। ‘विट्ठल’ का अर्थ होता है “अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञानरुपी प्रकाश बताने वाले”, अतः यह अलौकिक बालक पुष्टिमार्ग का पूर्ण विकास करेंगे.”

प्रभु के इस स्वरुप की सेवा श्री महाप्रभुजी के साथ श्री गुसांईजी करते थे एवं कालांतर में श्री गुसांईजी ने यह स्वरुप अपने द्वितीय पुत्र श्री गोविंदरायजी को सेवा हेतु प्रदान किया। श्री गोविंदरायजी ने प्रभु के स्वरुप को गोकुल के यशोदाघाट स्थित मंदिर में पधराकर वर्षों सेवा की. आपके पुत्र श्री बड़े कल्याणरायजी एवं उनके पुत्र श्री हरिरायजी महाप्रभुजीने भी यहीं मंदिर में प्रभु की भावपूर्ण सेवा करी। श्रीमद गोकुल में यह प्राचीन मंदिर और श्री हरिरायजी की बैठकजी आजभी बिराजित है।

द्वितीय गृह की वंशावली इस प्रकार है:
. जगद्गुरु श्रीमद वल्लभाचार्यजी महाप्रभुजी
. प्रभुचरण श्रीविठ्ठलनाथजी गुसाइंजी
. आद्य श्री गोविंदरायजी
. आद्य श्री कल्याणरायजी
. श्रीहरिरायजी महाप्रभुजी
. श्री गिरिधरजी
. श्री रघुनाथजी
. श्री गोविंदरायजी (द्वितीय)
. श्री विठ्ठलेशरायजी
१०. श्री योगी गोपेश्वरजी
११. श्री कृष्णरायजी
१२. श्री गोकुलोत्सवजी
१३. श्री कल्याणरायजी (द्वितीय)
१४. श्री गोपेश्वरजी
१५. श्री गिरिधरलालजी
१६. वर्तमान द्वि. पी. श्रीकल्याणरायजी (तृतीय)

वर्तमान में द्वितीय पीठाधीश गौस्वामी श्री कल्याणरायजी अपने पुत्रद्वय श्री हरिरायजी एवं श्री वागधीशजी सहित द्वितीय निधि श्रीविठ्ठलनाथजीकी सेवा में बिराजमान हैं।